शायरी
खो कर मैंने जाना वो जो पाकर कभी ना जाना था,
अपने में ही उलझा सा था मैं कितना अनजाना था,
रोते रोते हँस देता था, अब हँसते हँसते रो देता हूँ,
आँख ना छलके इसलिए हर ख़ुशी में ख़ुद को खो देता हूँ,
ख़ुशियों ने ना सिखलाया जो, ग़मों ने वो सिखलाना था,
अब जाना के सफ़र-ए-हयात बस ग़मों और ख़ुशियों का अफ़साना था।